Indian Economics
UNIT- 1
अर्थव्यवस्था की स्थिति: विकास की सीमाओं का विस्तार
1. परिचय और सिंहावलोकन (Introduction and Overview)
1. परिचय और सिंहावलोकन (Introduction and Overview)
- वैश्विक अनिश्चितता और भारतीय लचीलापन: भू-राजनीतिक तनावों और व्यापारिक व्यवधानों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था ने मजबूत गति बनाए रखी है,.
- विकास अनुमान (FY26): प्रथम अग्रिम अनुमान (FAE) के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.4% रहने का अनुमान है,,.
- रणनीतिक दृष्टिकोण: 'मैराथन और स्प्रिंट' एक साथ दौड़ने की आवश्यकता—घरेलू विकास को अधिकतम करना और बाहरी झटकों का प्रबंधन करना,,.
2. वैश्विक आर्थिक परिदृश्य: नाजुकता और विचलन (Global Economic Context)
- कमजोर वैश्विक विकास: भू-राजनीतिक विखंडन, व्यापार नीति की अनिश्चितता और उन्नत अर्थव्यवस्थाओं (AEs) बनाम उभरती अर्थव्यवस्थाओं (EMDEs) में अलग-अलग रुझान,,.
- तीन परिदृश्य (2026 के लिए): 'बिजनेस एज़ यूज़ुअल' (नाज़ुक सुरक्षा), 'अव्यवस्थित बहुध्रुवीय विखंडन', और 'प्रणालीगत शॉक कैस्केड' (वित्तीय और तकनीकी तनाव),,,.
- आर्थिक स्टेटक्राफ्ट (Box I.1): आर्थिक नीतियों का रणनीतिक उद्देश्यों (जैसे प्रतिबंध, टैरिफ, आपूर्ति श्रृंखला नियंत्रण) के लिए उपयोग और भारत के लिए 'रणनीतिक अनिवार्यता' (Strategic Indispensability) का महत्व,,.
3. घरेलू अर्थव्यवस्था के रुझान: मांग और आपूर्ति (Domestic Economy Trends)
- निजी खपत (PFCE): घरेलू मांग विकास का मुख्य आधार बनी हुई है; जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी बढ़कर 61.5% हो गई है, जो वित्त वर्ष 2012 के बाद सबसे अधिक है,.
- निवेश (GFCF): पूंजी निर्माण में मजबूती जारी है; जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी 30% से अधिक है, जो सार्वजनिक कैपेक्स और निजी निवेश में सुधार को दर्शाता है,,.
- आपूर्ति पक्ष (Supply Side):
- o कृषि: मानसून की अनुकूलता से विकास दर 3.1% अनुमानित,.
- o उद्योग: विनिर्माण गतिविधियों में तेजी
(8.4% वृद्धि)(7.0% वृद्धि अनुमानित, जबकि पहली छमाही में 8.4% रही) और क्षमता उपयोग में सुधार,,. - o सेवा क्षेत्र: विकास का मुख्य चालक (9.1% वृद्धि), विशेष रूप से वित्तीय, रियल एस्टेट और पेशेवर सेवाओं में मजबूती,,.
- सांख्यिकीय प्रणाली और नाउकास्टिंग: उच्च-आवृत्ति संकेतकों का उपयोग करके जीडीपी का वास्तविक समय में आकलन और डेटा गुणवत्ता में सुधार के प्रयास (Box I.3),,.
4. व्यापक आर्थिक बुनियादी ढांचे का आकलन (Assessment of Macroeconomic Fundamentals)
- मुद्रास्फीति (Inflation): खुदरा मुद्रास्फीति में गिरावट (अप्रैल-दिसंबर 2025 में 1.7% तक), विशेष रूप से खाद्य कीमतों में कमी, हालांकि कीमती धातुओं के कारण कोर मुद्रास्फीति थोड़ी सख्त है,.
- राजकोषीय स्थिति (Fiscal Policy): राजकोषीय घाटे में कमी (FY25 में 4.8% और FY26 बजट में 4.4% का लक्ष्य) और पूंजीगत व्यय (Capex) पर निरंतर जोर,,.
- मौद्रिक प्रबंधन और बैंकिंग: रेपो रेट में कटौती (125 bps) और बैंकिंग सिस्टम में तरलता; एनपीए (GNPA) अनुपात बहु-दशकीय निम्न स्तर (2.2%) पर,.
- बाहरी क्षेत्र (External Sector): चालू खाते का घाटा (CAD) नियंत्रण में (वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही (H1 FY26) में GDP का 0.8%), मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, और सेवा निर्यात द्वारा व्यापार घाटे की भरपाई,,.
- श्रम बाजार: बेरोजगारी दर में गिरावट और श्रम बल भागीदारी में सुधार,.
5. परिदृश्य और आगे की राह (Outlook and Way Forward)
- निकट अवधि का दृष्टिकोण: वित्त वर्ष 2027 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान 6.8% से 7.2% के बीच रहने की संभावना,.
- मध्यम अवधि की क्षमता (Box I.4): संरचनात्मक सुधारों, डिजिटलीकरण और बुनियादी ढांचे में निवेश के कारण भारत की मध्यम अवधि की संभावित वृद्धि दर (Potential Growth) बढ़कर 7% होने का आकलन,,.
- निष्कर्ष: वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद, घरेलू मांग और निवेश के दम पर भारतीय अर्थव्यवस्था स्थिर और मजबूत स्थिति में है,.
2. वैश्विक आर्थिक परिदृश्य: नाजुकता और विचलन (Global Economic Context)
1. कमजोर वैश्विक विकास: भू-राजनीतिक तनाव और विचलन (Weak Global Growth and Divergence)
सर्वेक्षण बताता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था नाजुक बनी हुई है और देशों के बीच विकास के रुझान अलग-अलग (diverging) हैं।
- विकास का मिला-जुला स्वरूप: यद्यपि वैश्विक विकास और व्यापार उम्मीद से बेहतर रहे हैं, लेकिन अंतर्निहित कमजोरियां मौजूद हैं। अमेरिका में विकास एआई (AI) निवेश से प्रेरित होकर मजबूत बना हुआ है, लेकिन वहां बेरोजगारी और मुद्रास्फीति की चिंताएं भी हैं। इसके विपरीत, चीन अपस्फीति (deflation) और संपत्ति क्षेत्र के संकट से जूझ रहा है, जबकि यूरोप में जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों में विकास मध्यम रहने की उम्मीद है,।
- उन्नत बनाम उभरती अर्थव्यवस्थाएं (AEs vs EMDEs): आईएमएफ (IMF) के अनुमानों के अनुसार, उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं (EMDEs) में विकास दर के अनुमानों में सुधार हुआ है, जबकि उन्नत अर्थव्यवस्थाओं (AEs) में मुद्रास्फीति के लगातार उच्च बने रहने की आशंका है।
- भू-राजनीतिक विखंडन: भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है, और व्यापार नीति अब दक्षता (efficiency) के बजाय सुरक्षा और राजनीतिक विचारों से आकार ले रही है। इससे वैश्विक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रवाह में गिरावट आई है (कंड्यूट इकोनॉमी को छोड़कर 2024 में 11% की गिरावट),।लेकिन इसी दौरान अमेरिका में FDI 19.7% बढ़ा ।
*कंड्यूट इकोनॉमी वे देश हैं जो मुख्य रूप से निवेश को दूसरे देशों में भेजने का काम करते हैं
2. नीतिगत अनिश्चितता: अमेरिकी टैरिफ और मौद्रिक नीतियां (Policy Uncertainty)
वैश्विक स्तर पर नीतिगत अनिश्चितता ऐतिहासिक रुझानों की तुलना में उच्च स्तर पर बनी हुई है।
- अमेरिकी टैरिफ का प्रभाव: अमेरिका द्वारा अप्रैल 2025 में घोषित पारस्परिक टैरिफ (Reciprocal Tariffs) और बाद में अगस्त में 25 % अतिरिक्त दंडात्मक टैरिफ (Penal Tarrif) ने शुरू में कम विकास और उच्च मुद्रास्फीति की चिंताएं पैदा कीं। हालांकि, व्यापार समझौतों और व्यवसायों द्वारा टैरिफ लागू होने से पहले खर्च बढ़ाने के कारण इसका अल्पकालिक प्रभाव उम्मीद से कम रहा, लेकिन अनिश्चितता बरकरार है。
- मौद्रिक नीतियों में भिन्नता: दुनिया भर के केंद्रीय बैंक आक्रामक मौद्रिक सख्ती से तटस्थ या उदार रुख की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन, अलग-अलग देशों में विकास और मुद्रास्फीति की गतिशीलता अलग होने के कारण उनकी ब्याज दरों के रास्ते (trajectories) भी अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए, बैंक ऑफ जापान ब्याज दरें बढ़ा रहा है, जबकि अन्य प्रमुख केंद्रीय बैंक कटौती कर रहे हैं।
- राजकोषीय दबाव: प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में (ब्राजील और भारत को छोड़कर) राजकोषीय घाटा महामारी से पहले के स्तर से काफी ऊपर बना हुआ है, जिससे लंबी अवधि की उधारी लागत (bond yields) बढ़ गई है।
3. आर्थिक स्टेटक्राफ्ट (Box I.1): आर्थिक नीतियों का रणनीतिक उपयोग (Economic Statecraft)
सर्वेक्षण में 'आर्थिक स्टेटक्राफ्ट' के पुनरुत्थान पर विशेष चर्चा की गई है, जिसका अर्थ है रणनीतिक उद्देश्यों (जैसे विदेश नीति या राष्ट्रीय सुरक्षा) को प्राप्त करने के लिए आर्थिक साधनों का जानबूझकर उपयोग करना।
- परिभाषा और कारण: आर्थिक अन्योन्याश्रयता (interdependence), जिसे कभी स्थिरता का स्रोत माना जाता था, अब भेद्यता (vulnerability) के रूप में देखा जा रहा है। देश अब आपूर्ति श्रृंखलाओं, महत्वपूर्ण खनिजों और प्रौद्योगिकियों पर नियंत्रण चाहते हैं। इसे 'अल्ट्रा-नेशनलिज्म' और बहुपक्षीय संस्थानों के कमजोर होने से बढ़ावा मिला है,।
- उपकरण (Tools): आर्थिक स्टेटक्राफ्ट के तहत देश कई तरह के उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं:
- o निर्यात नियंत्रण: जैसे अमेरिका द्वारा उन्नत सेमीकंडक्टर और एआई चिप्स पर प्रतिबंध।
- o महत्वपूर्ण खनिजों पर प्रतिबंध: जैसे चीन द्वारा दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (rare earth elements) के निर्यात को सख्त करना।
- o टैरिफ और प्रतिबंध: जैसे यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) और विभिन्न प्रतिबंध सूचियाँ (Sanctions)।
- भारत के लिए राह - रणनीतिक अनिवार्यता (Strategic Indispensability):
बॉक्स I.1 का निष्कर्ष है किभारत को केवल 'रणनीतिक लचीलापन' (Strategic Resilience) तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि 'रणनीतिक अनिवार्यता' की ओर बढ़ना चाहिए। इसका अर्थ है वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (GVCs) में ऐसी भूमिका निभाना जहाँ भारत द्वारा प्रदान की जाने वाली वस्तुओं या सेवाओं को आसानी से बदला न जा सके। यह आर्थिक संप्रभुता और दीर्घकालिक विकास की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
3. घरेलू अर्थव्यवस्था के रुझान: मांग पक्ष (Domestic Economy Trends: Demand Side)
1. निजी उपभोग: विकास का मुख्य इंजन (Private Consumption - PFCE)
निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास का सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है।
- वर्तमान स्थिति: वित्त वर्ष 2026 में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में निजी उपभोग की हिस्सेदारी बढ़कर 61.5% होने का अनुमान है, जो वित्त वर्ष 2012 के बाद का उच्चतम स्तर है,,।
- वृद्धि दर: वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही (H1) में इसमें 7.5% की वृद्धि दर्ज की गई, जो महामारी से पहले के रुझानों (6.9%) से अधिक है,।
- मुख्य कारण: यह मजबूती कम मुद्रास्फीति, स्थिर रोजगार की स्थिति और लोगों की क्रय शक्ति (Real Purchasing Power) में वृद्धि के कारण आई है। ग्रामीण खपत में स्थिरता और प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष करों में सुधार के कारण शहरी खपत में बढ़ोतरी ने इसे और गति दी है,।
2. निवेश: पूंजी निर्माण में तेजी (Investment - GFCF)
सकल स्थायी पूंजी निर्माण (GFCF) निवेश गतिविधियों में मजबूती का संकेत दे रहा है।
- वर्तमान स्थिति: वित्त वर्ष 2026 में जीडीपी में निवेश की हिस्सेदारी 30% रहने का अनुमान है। पहली छमाही में इसकी हिस्सेदारी 30.5% रही, जो महामारी पूर्व के औसत (28.6%) से काफी अधिक है,,।
- वृद्धि दर: वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में निवेश में 7.6% की वृद्धि हुई,।
- मुख्य कारण: इसका मुख्य श्रेय सरकार द्वारा निरंतर किए जा रहे पूंजीगत व्यय (Public Capex) को जाता है। साथ ही, निजी क्षेत्र के निवेश (Private Investment) में भी सुधार के संकेत मिले हैं, जो नए कॉर्पोरेट निवेश की घोषणाओं से स्पष्ट होता है,。
3. निर्यात: सेवाओं का सहारा (Exports)
वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद, बाहरी मांग ने भारत के विकास को सहारा दिया है।
- वर्तमान स्थिति: FY2026 के अग्रिम अनुमानों (FAE) के अनुसार जीडीपी में निर्यात (वस्तु और सेवा) की हिस्सेदारी 21.6% रहने का अनुमान है,।जबकि पहली छमाही (H1) में यह 21.2% थी
- वृद्धि दर: वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में निर्यात में 5.9% की वृद्धि दर्ज की गई,।
- मुख्य कारण: वस्तुओं (Goods) के निर्यात में उतार-चढ़ाव के बावजूद, सेवा निर्यात (Services Exports) ने एक स्थिर एंकर की भूमिका निभाई है। व्यापार विविधीकरण (Trade Diversification) के प्रयासों ने भी निर्यात की गति को बनाए रखने में मदद की है,।
- निष्कर्ष: सर्वेक्षण बताता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से घरेलू मांग (Domestic Demand) द्वारा संचालित है, जिसमें निजी उपभोग और निवेश की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। यह संरचना अर्थव्यवस्था को वैश्विक झटकों के प्रति लचीला (Resilient) बनाती है,,।
4. घरेलू अर्थव्यवस्था के रुझान: आपूर्ति पक्ष (Domestic Economy Trends: Supply Side)
1. प्रमुख क्षेत्रों का प्रदर्शन (Sectoral Performance)
सर्वेक्षण के अनुसार, आपूर्ति पक्ष (उत्पादन) से अर्थव्यवस्था को तीन मुख्य इंजनों द्वारा गति मिल रही है:
- सेवा क्षेत्र (Services - विकास का मुख्य चालक):
- प्रदर्शन: सेवा क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत स्तंभ बना हुआ है। वित्त वर्ष 2026 में इसके 9.1% की दर से बढ़ने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष (7.2%) से अधिक है।
- मुख्य घटक: व्यापार, होटल, परिवहन और संचार सेवाओं में 7.5% की वृद्धि का अनुमान है। वित्तीय, रियल एस्टेट और पेशेवर सेवाओं में 9.9% की मजबूत वृद्धि देखी जा रही है।
- स्थिति: यह क्षेत्र महामारी से पूर्व के स्तर से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है और शहरी रोजगार का एक बड़ा स्रोत है,।
- उद्योग (Industry - विनिर्माण में तेजी):
- प्रदर्शन: औद्योगिक क्षेत्र में 6.2% की वृद्धि का अनुमान है। वर्ष की पहली छमाही (H1) में इसने 7% की वृद्धि दर्ज की,।
- विनिर्माण (Manufacturing): सबसे उल्लेखनीय सुधार विनिर्माण क्षेत्र में हुआ है, जिसने पहली छमाही में 8.4% की वृद्धि दर्ज की। यह कंपनियों द्वारा अपनी उत्पादन क्षमता के बेहतर उपयोग और मजबूत मांग को दर्शाता है,।
- निर्माण (Construction): बुनियादी ढांचे (Infrastructure) पर सरकार के जोर के कारण निर्माण गतिविधियों में
7%की वृद्धि बनी हुई है।पहली छमाही में 7.4% की वृद्धि दर्ज की गई (पूरे वर्ष के लिए 7.0% अनुमानित)
- कृषि और संबद्ध क्षेत्र (Agriculture - स्थिरता का स्रोत):
- प्रदर्शन: वित्त वर्ष 2026 में कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 3.1% रहने का अनुमान है। पहली छमाही में यह 3.6% रही।
- कारण: अच्छे मानसून के कारण खरीफ की फसल बेहतर रही है और रबी की बुवाई (विशेषकर गेहूं और चना) में भी बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा, संबद्ध क्षेत्र जैसे पशुपालन और मत्स्य पालन 5-6% की स्थिर दर से बढ़ रहे हैं, जो फसल उत्पादन में होने वाले उतार-चढ़ाव की भरपाई करते हैं,।
2. तकनीक और डेटा: आर्थिक निगरानी के नए औजार
अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर मापने के लिए सरकार ने आधुनिक तकनीकों और डेटा सुधारों को अपनाया है:
- जीडीपी नाउकास्टिंग (Box I.2 - वास्तविक समय में आकलन):
- क्या है? आधिकारिक जीडीपी डेटा आने में दो महीने की देरी होती है। इस देरी को पाटने के लिए 'नाउकास्टिंग' (Nowcasting) मॉडल का उपयोग किया जा रहा है,।
- कैसे काम करता है? यह मॉडल 17 उच्च-आवृत्ति संकेतकों (High-frequency indicators) का उपयोग करता है, जैसे- बिजली की खपत, वाहनों की बिक्री, रेलवे माल ढुलाई, जीएसटी संग्रह, केंद्र सरकार का सकल कर राजस्व (Central Government Gross Tax Revenues) और निर्यात डेटा।
- लाभ: इससे नीति निर्माताओं को अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति का सटीक और तुरंत पता चलता है, जिससे वे समय पर निर्णय ले सकते हैं।
- सांख्यिकीय प्रणाली सुदृढ़ीकरण (Box I.3 - बेहतर डेटा):
- नए सर्वेक्षण: सेवा क्षेत्र की कंपनियों (ASISSE) और घरेलू आय व कर्ज (AIDIS) पर नए और व्यापक सर्वेक्षण शुरू किए जा रहे हैं,।
- आधार वर्ष में बदलाव (Rebasing): जीडीपी और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) के आधार वर्ष को बदलकर 2022-23 किया जा रहा है ताकि डेटा में अर्थव्यवस्था की आधुनिक तस्वीर दिखे,।
- डिजिटल पहल: डेटा संग्रह को डिजिटल (CAPI) बनाया गया है और 'ई-सांख्यिकी' (eSankhyiki) पोर्टल के माध्यम से डेटा को आम जनता के लिए सुलभ बनाया जा रहा है।
3. निहितार्थ (Implications)
- संतुलित विकास: अर्थव्यवस्था केवल एक क्षेत्र पर निर्भर नहीं है। कृषि जहाँ सुरक्षा प्रदान कर रही है, वहीं विनिर्माण और सेवा क्षेत्र विकास को गति दे रहे हैं। यह "संतुलित विकास" बाहरी झटकों (जैसे वैश्विक मंदी) के खिलाफ भारत की रक्षा करता है,।
- नीति निर्माण में सटीकता: 'नाउकास्टिंग' और बेहतर सांख्यिकीय डेटा का अर्थ है कि सरकार और आरबीआई अब "अंधेरे में तीर" नहीं चलाएंगे। वे वास्तविक समय के डेटा के आधार पर ब्याज दरों या बजट आवंटन पर सटीक निर्णय ले सकेंगे,।
- रोजगार और निवेश: विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र में तेजी का सीधा अर्थ है रोजगार के अधिक अवसर। साथ ही, क्षमता उपयोग में सुधार निजी क्षेत्र को नए निवेश (Capex) के लिए प्रेरित करेगा।
- ग्रामीण मांग में स्थिरता: कृषि और संबद्ध क्षेत्रों का अच्छा प्रदर्शन ग्रामीण आय को समर्थन देगा, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में मांग (जैसे ट्रैक्टर, दोपहिया वाहन, एफएमसीजी) बनी रहेगी,।
5. व्यापक आर्थिक बुनियादी ढांचे का आकलन (Assessment of Macroeconomic Fundamentals)
1. मुद्रास्फीति (Inflation): महंगाई पर लगाम
- स्थिति: देश में खुदरा महंगाई (CPI) में भारी गिरावट आई है। यह वित्त वर्ष 2026 (अप्रैल-दिसंबर) में गिरकर 1.7% हो गई है, जो ऐतिहासिक रूप से बहुत कम है.
- कारण: इसका मुख्य कारण खाद्य पदार्थों, विशेषकर सब्जियों और दालों की कीमतों में भारी कमी आना है।
- कोर इन्फ्लेशन की पहेली: यद्यपि 'कोर इन्फ्लेशन' (Core Inflation) 4.62% के आसपास थोड़ी सख्त दिख रही है, लेकिन यह मुख्य रूप से सोने और चांदी की कीमतों में उछाल के कारण है। यदि कीमती धातुओं को हटा दें, तो अंतर्निहित महंगाई 2.3% के आसपास है, जो यह दर्शाता है कि अर्थव्यवस्था में मांग के कारण कीमतें नहीं बढ़ रही हैं,.
2. राजकोषीय स्थिति (Fiscal Policy): समझदारी भरा खर्च
- घाटे में कमी: सरकार अपने खर्च और कमाई के बीच के अंतर (राजकोषीय घाटे) को कम करने में सफल रही है। वित्त वर्ष 2025 में यह 4.8% था और वित्त वर्ष 2026 के लिए इसे 4.4% करने का लक्ष्य है.
- खर्च की गुणवत्ता: सरकार का ध्यान केवल खर्च करने पर नहीं, बल्कि 'पूंजीगत व्यय' (Capex) यानी सड़क, रेलवे और बुनियादी ढांचे पर खर्च करने पर है। अप्रैल-नवंबर 2025 के दौरान पूंजीगत व्यय में 28% की वृद्धि हुई है,.
- कमाई: टैक्स कलेक्शन, विशेषकर GST, रिकॉर्ड स्तर पर है, जो मजबूत आर्थिक गतिविधि को दर्शाता है.
3. मौद्रिक प्रबंधन और ऋण (Monetary Management): सस्ता कर्ज और मजबूत बैंक
- ब्याज दरें: महंगाई कम होने के कारण आरबीआई ने रेपो रेट में 125 आधार अंकों (bps) की कटौती की है और बाजार में नकदी (liquidity) बढ़ाई है। इसका लाभ ग्राहकों को मिल रहा है क्योंकि बैंकों ने भी कर्ज सस्ता किया है.
- बैकों की सेहत: भारतीय बैंकिंग सिस्टम अब तक की सबसे मजबूत स्थिति में है। बैंकों का फंसा हुआ कर्ज (GNPA) गिरकर 2.2% के बहु-दशकीय निचले स्तर पर आ गया है.
- ऋण प्रवाह: बैंक ऋण में वृद्धि जारी है, और बड़ी कंपनियां अब बैंकों के अलावा शेयर बाजार और बॉन्ड मार्केट से भी पैसा जुटा रही हैं, जो एक परिपक्व वित्तीय बाजार का संकेत है.
4. बाहरी क्षेत्र (External Sector): सुरक्षा और स्थिरता
- चालू खाता घाटा (CAD): भारत का CAD पूरी तरह नियंत्रण में है (H1 FY26 में GDP का 0.8%)। हम वस्तुओं के आयात पर जितना खर्च करते हैं, उसकी भरपाई हमारे सेवा निर्यात (IT, बिजनेस सर्विसेज) और विदेश से आने वाले पैसे (Remittances) से हो रही है,.
- विदेशी मुद्रा भंडार: भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार (16 जनवरी 2026 तक 701.4 बिलियन डॉलर) है, जो 11 महीने के आयात के लिए काफी है। यह वैश्विक झटकों के खिलाफ एक बड़ा सुरक्षा कवच है,.
5. श्रम बाजार (Labour Market): रोजगार में सुधार
- रुझान: बेरोजगारी दर में गिरावट आई है और श्रम बल भागीदारी (LFPR)
में सुधार हुआ है।स्थिर रही है (stabilising) - डेटा: आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के आंकड़े बताते हैं कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति स्थिर और बेहतर हुई है.
निहितार्थ (Implications):
- आम आदमी की क्रय शक्ति बढ़ेगी: महंगाई, विशेषकर खाद्य महंगाई में कमी का सीधा अर्थ है कि आम आदमी की जेब पर बोझ कम होगा और उनकी 'वास्तविक क्रय शक्ति' (Real Purchasing Power) बढ़ेगी, जिससे खपत को बढ़ावा मिलेगा.
- निवेश के लिए अनुकूल माहौल: राजकोषीय घाटे में कमी और मजबूत बैंकिंग सिस्टम के कारण ब्याज दरें कम हो रही हैं। इससे कंपनियों के लिए निवेश करना सस्ता होगा और "निजी निवेश चक्र" (Private Investment Cycle) में तेजी आएगी,.
- आर्थिक स्थिरता: दुनिया भर में चल रहे भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद, भारत का बाहरी क्षेत्र (External Sector) मजबूत है। कम CAD और उच्च विदेशी मुद्रा भंडार का मतलब है कि रुपये में भारी उतार-चढ़ाव की संभावना कम है और अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों को झेलने में सक्षम है.
- भविष्य का विकास: सरकार द्वारा कैपेक्स (Capex) पर निरंतर जोर देने से देश की उत्पादक क्षमता (Productive Capacity) बढ़ रही है। इसी आधार पर सर्वे ने भारत की मध्यम अवधि की संभावित विकास दर (Potential Growth Rate) को बढ़ाकर 7% आंका है.
6. परिदृश्य और आगे की राह (Outlook and Way Forward)
1. निकट अवधि का दृष्टिकोण: वित्त वर्ष 2027 की तस्वीर
इकोनॉमिक सर्वे का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में है।
- विकास अनुमान (FY27): सर्वे का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में भारत की वास्तविक जीडीपी (Real GDP) 6.8% से 7.2% की दर से बढ़ेगी।
- समायोजन का वर्ष: वित्त वर्ष 2026 बाहरी चुनौतियों (जैसे टैरिफ और व्यापार अनिश्चितता) से भरा था। सरकार ने जीएसटी युक्तिकरण और डिकंट्रोल (deregulation) जैसे सुधारों के साथ इसका जवाब दिया। इसलिए, वित्त वर्ष 2027 को "समायोजन के वर्ष" (Year of Adjustment) के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ कंपनियां और परिवार इन सुधारों के अनुकूल होकर मांग और निवेश को बढ़ाएंगे।
- स्थिरता के कारक: कम महंगाई, बैंकों और कंपनियों की मजबूत बैलेंस शीट, और सरकार द्वारा जारी पूंजीगत निवेश (Capex) इस विकास दर को सहारा देंगे।
2. मध्यम अवधि की क्षमता: 7% की नई रफ़्तार (Box I.4)
सर्वे का सबसे महत्वपूर्ण आकलन यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था की "संभावित विकास दर" (Potential Growth Rate) बढ़ गई है।
- क्या है बदलाव?: तीन साल पहले यह अनुमान 6.5% था, जिसे अब बढ़ाकर 7% कर दिया गया है,। इसका अर्थ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब बिना ओवरहीटिंग (महंगाई बढ़ने) के लंबे समय तक 7% की दर से बढ़ सकती है।
- इसके पीछे के कारण (संरचनात्मक सुधार): यह बढ़ोतरी रातों-रात नहीं हुई है, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में किए गए ठोस सुधारों का परिणाम है:
- भौतिक और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर: पिछले दशक में हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी होना, जलमार्गों का विकास और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) ने लॉजिस्टिक्स की लागत कम की है और दक्षता बढ़ाई है,।
- निवेश और विनिर्माण: पीएलआई (PLI) योजनाएं, एफडीआई उदारीकरण और कॉरपोरेट बैलेंस शीट में सुधार ने निजी निवेश के लिए रास्ता खोला है,।
- श्रम शक्ति: श्रम बाजार में औपचारिकता (Formalisation) बढ़ी है और महिलाओं की भागीदारी में सुधार हुआ है।
3. रणनीतिक प्राथमिकताएं: भविष्य की रणनीति
सर्वे ने भारत के लिए एक बहुत ही स्पष्ट और व्यावहारिक रणनीति का सुझाव दिया है:
- मैराथन और स्प्रिंट एक साथ: भारत को घरेलू विकास को अधिकतम करना है (स्प्रिंट/तेज दौड़) और साथ ही बाहरी झटकों (जैसे युद्ध या मंदी) से खुद को बचाना है (मैराथन/लंबी दौड़),।
- साझेदारी (Partnership): सरकार अकेले विकास का रथ नहीं खींच सकती। सर्वे "एंटरप्रेन्योरियल स्टेट" (उद्यमी राज्य) की बात करता है, जहाँ सरकार दिशा तय करे, लेकिन निजी क्षेत्र और नागरिक इसमें बराबर के भागीदार हों,।
- विनिर्माण और रणनीतिक स्वायत्तता: केवल आयात कम करना (Swadeshi) काफी नहीं है। भारत को "रणनीतिक अनिवार्यता" (Strategic Indispensability) हासिल करनी होगी। इसका मतलब है कि भारत को वैश्विक सप्लाई चेन का इतना महत्वपूर्ण हिस्सा बनना होगा कि दुनिया भारत को नजरअंदाज न कर सके,। इसके लिए विनिर्माण (Manufacturing) में विश्व स्तरीय प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता आवश्यक है,।
निहितार्थ (Implications):
- रोजगार के बेहतर अवसर: 7% की संभावित विकास दर का सीधा अर्थ है कि अर्थव्यवस्था में नए रोजगार सृजित करने की क्षमता बढ़ गई है। विनिर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर देने से मध्यम आय वाले और कुशल श्रमिकों के लिए नौकरियां पैदा होंगी,।
- निवेशकों के लिए भरोसा: जब किसी देश की 'संभावित विकास दर' बढ़ती है, तो इसका मतलब है कि वहां निवेश करना सुरक्षित और लाभदायक है। यह भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए और अधिक आकर्षक बनाएगा, जिससे एफडीआई (FDI) और तकनीकि प्रवाह बढ़ेगा।
- महंगाई से राहत: आपूर्ति पक्ष (Supply side) के मजबूत होने (बेहतर लॉजिस्टिक्स, नई फैक्ट्रियां) का मतलब है कि मांग बढ़ने पर भी महंगाई बेकाबू नहीं होगी। सर्वे के अनुसार, कोर मुद्रास्फीति (सोने-चांदी को छोड़कर) में कमी यह दर्शाती है कि देश की उत्पादन क्षमता बढ़ रही है।
